आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने पूछा कि विशेष गहन संशोधन (SIR) के दौरान स्थानीय निकाय चुनाव कैसे हो सकते हैं, जब मतदाताओं के नाम अभी भी हटाए जा रहे हैं।

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने मंगलवार, 1 सितंबर 2026 को चुनाव कैलेंडर पर एक कड़ा सवाल उठाते हुए पूछा कि स्थानीय निकाय चुनाव कैसे कराए जा सकते हैं जब मतदाता सूची का विशेष गहन संशोधन (SIR) अभी भी चल रहा है?
न्यायमूर्ति वी. सुजाता (जिन्हें वड्डीबोयिना सुजाता के रूप में भी दर्ज किया गया है) YSR कांग्रेस पार्टी के महासचिव लेल्ला अप्पिरेड्डी की याचिका पर सुनवाई कर रही थीं। अप्पिरेड्डी ने मांग की थी कि SIR पूरा होने और अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने तक चुनाव स्थगित कर दिए जाएं। न्यायाधीश ने इस बात पर गौर किया कि SIR के दौरान हटाए गए मतदाता अपील कर सकते हैं, और उन अपीलों से अंतिम मतदाता सूची बदल सकती है। उन्होंने कहा कि मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर चुनाव कराने से लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा सकता है। इस संदर्भ में YSRCP की चिंताएं पूरी तरह से जायज हैं।
वरिष्ठ वकील सुब्रमण्यम श्रीराम ने अदालत को बताया कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) से 3 अक्टूबर तक SIR पूरा करने की उम्मीद है। याचिकाकर्ता पक्ष ने मांग की कि चुनाव या तो अंतिम मतदाता सूची पर कराए जाएं, या फिर उन सूचियों पर जिनमें नामांकन की अंतिम तिथि तक के सभी बदलाव शामिल हों।
अधिवक्ता जनरल दम्मलपति श्रीनिवास ने इसके विपरीत तर्क दिया कि मतदाता सूची का संशोधन एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और इससे चुनाव कराने में कोई बाधा नहीं आती। अदालत के समक्ष एक सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का हवाला दिया गया — जिसमें कहा गया था कि चुनाव अधिसूचना की तारीख पर मतदाता सूची की जो स्थिति हो, उसके आधार पर चुनाव कराए जा सकते हैं।
राज्य चुनाव आयोग (SEC) के वकील कनापार्थी अजय ने चेतावनी दी कि इस मांग को मान लेने से चुनाव पांच से छह महीने तक टल सकते हैं। सार्वजनिक दस्तावेजों में दी गई जानकारी के अनुसार, SEC ने 1 जनवरी को अर्हता तिथि मानकर विधानसभा की सूचियों के आधार पर 3 सितंबर तक वार्ड-वार सूचियां अधिसूचित कर दी थीं। इसके अलावा, वार्ड-वार पंचायत सूचियां 15 अप्रैल को और शहरी सूचियां 3 सितंबर को प्रकाशित की गई थीं, तथा सुधार की प्रक्रिया नामांकन की अंतिम तिथि तक चलती है।
न्यायमूर्ति सुजाता ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वे इस याचिका को मुख्य न्यायाधीश लिसा गिल की पीठ के समक्ष रखें, जो मुख्य न्यायाधीश की मंजूरी पर निर्भर करेगा। इस मामले को स्थानीय निकाय से जुड़े अन्य लंबित जनहित याचिकाओं के साथ टैग कर दिया गया है, और मुख्य न्यायाधीश की पीठ की सुनवाई 9 सितंबर को तय की गई है।
इस रिपोर्ट में न तो किसी 'फॉर्म बी' का जिक्र है और न ही चुनाव की किसी तारीख की घोषणा की गई है। रिकॉर्ड के अनुसार स्थानीय निकाय चुनाव की कोई अधिसूचित तिथि मौजूद नहीं है। यदि कोई तिथि अधिसूचित नहीं की गई है, तो वह अधिसूचित नहीं है। 1 सितंबर की सुनवाई मुख्य रूप से क्रम को लेकर एक न्यायिक सवाल है — पहले SIR पूरा हो, या मौजूदा सूचियों पर अधिसूचना जारी हो — यह वार्डों की कोई चुनाव सूची नहीं है।
इसके परिणाम स्पष्ट हैं। स्थानीय निकाय चुनाव आने वाले कई वर्षों के लिए गांव, मंडल और नगरपालिका स्तर की सत्ता तय करते हैं। यदि SIR के तहत हटाए गए नाम बिना अपील प्रक्रिया पूरी हुए ही अंतिम मान लिए जाएं, तो रातों-रात किसी बूथ की सूची सिकुड़ सकती है। यदि चुनाव अंतिम सूचियों के लिए रुकते हैं, तो SEC की पांच से छह महीने की देरी वाली चेतावनी विपक्ष के लिए एक मौका और सत्ता पक्ष के लिए सिरदर्द बन जाती है। वहीं, यदि अधिसूचना-तिथि की सूचियों पर चुनाव आगे बढ़ते हैं, तो हटाए गए मतदाताओं को अपना नाम वापस सूची में आने से पहले ही नामांकन की समय सीमा समाप्त मिल सकती है।
अधिवक्ता जनरल का यह तर्क कि सूची में संशोधन निरंतर चलता रहता है, पूरे भारत में एक प्रशासनिक डिफ़ॉल्ट है: मतदाता सूचियां कभी भी पूरी तरह से स्थिर नहीं रहतीं। वहीं, याचिकाकर्ता का तर्क यह है कि यह SIR कोई सामान्य वार्षिक बदलाव नहीं है; यह एक विशेष गहन संशोधन है जिसके 3 अक्टूबर तक चलने की उम्मीद है, और एक बदलती हुई सूची पर स्थानीय चुनाव कराने से मतदान का अधिकार खोखला हो सकता है।
9 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश की पीठ के बैठने तक, आंध्र प्रदेश का स्थानीय निकाय चुनाव कैलेंडर इसी तनाव में उलझा रहेगा। इस रिपोर्ट में 1 सितंबर के अवलोकन, 3 अक्टूबर तक SIR पूरा होने की समय सीमा, पांच से छह महीने की देरी की चेतावनी, 15 अप्रैल और 3 सितंबर को सूचियों के प्रकाशन, और किसी अधिसूचित चुनाव तिथि के न होने की बात दर्ज की गई है। यह रिपोर्ट उस चुनाव कार्यक्रम को नहीं लिख रही है जो अदालत को अभी तक दिखाया ही नहीं गया है।
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