तेलंगाना हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सुर्यपेट में मिले नौ बच्चों के माता-पिता की पहचान न होने पर राज्य से दो सप्ताह में शिशु संरक्षण के आंकड़े मांगे।

तेलंगाना हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने सोमवार, 24 अगस्त 2026 को राज्य सरकार से उन शिशुओं के राज्यव्यापी आंकड़े मांगे जिन्हें सुरक्षात्मक हिरासत (प्रोटेक्टिव कस्टडी) में लिया गया है। बेंच ने यह भी दर्ज किया कि सुर्यपेट में मिले नौ बच्चों के जैविक माता-पिता की अभी तक पहचान नहीं हो पाई है। इस मामले की सुनवाई हैदराबाद हाईकोर्ट में हुई, जबकि सुर्यपेट में बच्चों को बरामद किया गया था। बच्चों को सुर्यपेट की बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया गया और आश्रय की कमी के कारण उन्हें नलगोंडा शिफ्ट कर दिया गया। एक अन्य सार्वजनिक विवरण के अनुसार, बच्चों को नलगोंडा के शिशु गृह (Shishu Gruha) में रखा गया है। आश्रय के लिए शिफ्ट करना कोई गोद लेने का आदेश (अडॉप्शन ऑर्डर) नहीं है।
बेंच में चीफ जस्टिस अपरेष कुमार सिंह और जस्टिस जी.एम. मोहिउद्दीन शामिल थे। (अन्य सार्वजनिक विवरणों में दूसरे जज का नाम घौस मीर मोहिउद्दीन भी दिया गया है। यह डेस्क दोनों नामों को दर्ज कर रही है और किसी एक को चुपचाप नहीं चुनेगी।)
सुर्यपेट में नौ बच्चे बरामद किए गए थे। एक विवरण में उनकी उम्र 10 महीने, 9 महीने, तीन साल, 18 महीने, सात महीने, 18 महीने, तीन साल, दो महीने और 27 महीने बताई गई है। एक अन्य विवरण के अनुसार, बच्चों की उम्र दो महीने से तीन साल के बीच है। बच्चों को सुर्यपेट की बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया गया और आश्रय की कमी के कारण उन्हें नलगोंडा शिफ्ट कर दिया गया। एक अन्य विवरण के अनुसार, बच्चों को नलगोंडा के शिशु गृह में रखा गया है। आश्रय की कमी के लिए शिफ्ट करना कोई गोद लेने का आदेश नहीं है।
कोर्ट ने दर्ज किया कि आंगनवाड़ी और स्कूल तंत्र के बावजूद पुलिस जैविक माता-पिता की पहचान नहीं कर पाई है। सोमवार की सुनवाई के एक विवरण में कहा गया है कि जांच प्रभावी नहीं थी, जो कि बेंच की दर्ज की गई असहमति है। यह किसी नामित आरोपी के खिलाफ कोई अंतिम आपराधिक निष्कर्ष नहीं है। बाल कल्याण समिति को सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट (जो जून 2026 में ही जमा हुई थी) से पहले सेंट्रल अडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (CARA) पोर्टल पर इन नौ बच्चों को अपलोड करने के लिए दोषी ठहराया गया। रिपोर्ट से पहले अपलोड करना वह गलती है जिसे बेंच ने उजागर किया है। यह निष्कर्ष नहीं है कि इन नौ बच्चों को गोद दिया जा चुका है।
बेंच ने संदिग्ध अवैध कब्जे या खरीद से बचाए गए बच्चों; संरक्षण गृहों में रहने वाले बच्चों; और स्पॉन्सरशिप तथा फोस्टर-केयर (पालक देखभाल) के लाभार्थियों पर दो सप्ताह के भीतर राज्यव्यापी आंकड़े मांगे। फोस्टर-केयर की दर ₹4,000 प्रति माह प्रति बच्चा दर्ज की गई है। रिपोर्ट पर निदेशक (Director) या अपर सचिव (Additional Secretary) से नीचे के अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं होने चाहिए। महिला एवं बाल कल्याण के साथ-साथ समाज कल्याण और गृह विभाग को भी पक्षकार (implead) बनाया जाना है। अगली सुनवाई 2 सितंबर 2026 को होगी। दो सप्ताह की समय-सीमा और 2 सितंबर की तारीख, दोनों ही सोमवार के आदेश का हिस्सा हैं।
एक विवरण के अनुसार, चीफ जस्टिस ने कहा कि यह मुद्दा केवल सुर्यपेट तक सीमित नहीं हो सकता है और इसके लिए एक अलग स्वतः संज्ञान जनहित याचिका (suo motu PIL) की आवश्यकता हो सकती है। यह दायरे के बारे में एक न्यायिक सावधानी है, न कि कोई नई अधिसूचित याचिका। चीफ जस्टिस ने अपने झारखंड के कार्यकाल के दौरान लगभग 27,000 ग्राम समितियों के मॉडल का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने एक दृष्टिबाधित भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी का उल्लेख किया। एक विवरण में यह आंकड़ा 27,000 दर्ज किया गया है। इस अधिकारी का नाम उपलब्ध दस्तावेजों में नहीं है और न ही कोई नाम गढ़ा जाएगा।
एक विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता नलगोंडा के सुराराम के रहने वाले मुथुनेनी वेंकन्ना हैं, जो एक किसान हैं और एकल-न्यायाधीश द्वारा उनकी याचिका खारिज किए जाने के बाद बच्चों की कस्टडी मांग रहे हैं। एकल-न्यायाधीश की खारिज की गई याचिका और डिवीजन-बेंच का डेटा आदेश, दोनों सोमवार के रिकॉर्ड में हैं। बेंच ने अंग-तस्करी और भिक्षावृत्ति के जोखिम की चेतावनी दी है, लेकिन यह कोई सिद्ध तथ्य नहीं है। यह डेस्क किसी तस्करी के दोषसिद्धि के बारे में नहीं लिखेगी जिसका सोमवार की सुनवाई में उल्लेख नहीं है।
सुर्यपेट वह जगह है जहां से बच्चों को बरामद किया गया था। नलगोंडा और शिशु गृह वह जगह है जहां बच्चों को आश्रय दिया गया है। इस मामले में फॉर्म बी या किसी नागरिक-चुनाव की तारीख की कोई अधिसूचना नहीं दी गई है। 2 सितंबर की तारीख हाईकोर्ट की सुनवाई है, न कि विधानसभा का सत्र और न ही कोई चुनाव अधिसूचना।
जब तक दो सप्ताह के भीतर डेटा नहीं आ जाता और 2 सितंबर की सुनवाई में अगला आदेश नहीं लिखा जाता, तब तक सार्वजनिक रिकॉर्ड में ये तथ्य दर्ज रहेंगे: सुर्यपेट में मिले नौ बच्चे जिनकी उम्र दो महीने से तीन साल के बीच है; जून 2026 की सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट से पहले बाल कल्याण समिति द्वारा अपलोड करना; अज्ञात जैविक माता-पिता; कोर्ट की यह टिप्पणी कि जांच प्रभावी नहीं थी; दो सप्ताह के भीतर राज्यव्यापी कस्टडी और फोस्टर-केयर के आंकड़े जिनकी दर ₹4,000 प्रति माह प्रति बच्चा है; रिपोर्ट पर निदेशक या अपर सचिव से नीचे के अधिकारी के हस्ताक्षर न होने के निर्देश; समाज कल्याण और गृह विभाग को पक्षकार बनाना; एक संभावित अलग स्वतः संज्ञान याचिका की चर्चा (लेकिन अधिसूचना नहीं); झारखंड के 27,000 ग्राम समितियों के मॉडल का हवाला; और याचिकाकर्ता मुथुनेनी वेंकन्ना। इस मामले में तस्करी से जुड़े हर शब्द को सावधानी के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी सिद्ध अपराध के रूप में।
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